टहनियां सुख गयी पत्ते गए झड़

  • हिमांशु हंसराज

Abstract

लग रहा है आया मौसम पतझड़ खुशियों भरी जीवन में 
गम की एक साम हस्ते खेलते उपवन में ख़ामोशी की गान
छोड़ पुराने वस्त्र सहकर मौसम की मार जन जन हो रहा त्रस्त्र 
खुशियों का सूरज हुआ अस्त सब अपने काम में हुए व्यस्त 
गर्मी से परस्त जीवन अस्त व्यस्त हरे पत्ते सुख झड़ने लगे 
बागों से सड़क के किनारे ऐसा लग रहा जन जीवन सारे
दिन में दिखने लगे तारें गर्मी ने किया बेहाल कैसा मौसम कैसा ये साल सूखने लगे निर्झर आया मौसम पतझड़
Published
2017-03-14