लेश मात्र प्यार
Abstract
उन दिनों मेरा हाथ अपने हाथ में लिए,गोदी में ले सहलाते – तुम
और कभी तुम्हारा हाथ लिए ,
सहलाती – मैं,
कभी पार्क में, तो कभी सिनेमा हॉल में,
कभी नहर किनारे, तो कभी नदिया तीरे,
तब बातें कम ही होती थी ,
पर एक दूसरे के अहसासों का,
अहसास हो ही जाता था.



