मेहरुन्निसा परवेज़ की कहानियों में आंचलिकता

  • डॉ. एम. नारायण रेड्डी

Abstract

पहाडियों तथा जंगलों के निर्दोष संसार के निवासियों आदिवासी, आदिम जाति, जनजाति, अनुसूचित जनजाति, वनवासी, काननवासी, अरण्यक आदि अनेक नामों से हमारे समाज में पहचाने जाते हैं। जंगलों के बीच इनका सरलतम् और तनावहीन समाज वर्षों से पल्लवित है। विश्व के अनेक भागों में वे पाए जाते हैं। कहा जाता है कि भारत में कुल जनसंख्या में से सात प्रतिशत लोग इस समूह के हैं।  तथाकथित ‘सभ्य’ समाज के लोग उन्हें पिछड़े वर्ग के मानते हैं क्योंकि वे प्रगतिशील संसार से अपरिचित और जंगलों के एकान्त जीवन से बाहर नहीं आना चाहते हैं। लेकिन इस सत्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अन्य ‘सभ्य’ लोगों की तुलना में वे लोग अधिक स्वाभाविक और तनावहीन जिन्दगी जी रहे हैं।

            मेहरुन्निसा परवेज़ के कहानी साहित्य में आदिवासी जीवन का विश्लेषण करने से पूर्व ‘आदिवासी’ शब्द का अर्थ समझ लेना अनिवार्य है। यह माना जाता है कि ‘जनजाति’ के लिए महात्मा गाँधी ने ‘आदिवासी’ शब्द का प्रयोग किया था। ‘आदिवासी’ शब्द का अर्थ अंग्रेजी भाषा के ‘अबोरजिनल’ या ‘ट्राइबल’ के हिन्दी रूपान्तर के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। आदिवासी एक समूह है जिसका प्राय: एक निश्चित क्षेत्र, बोली और सांस्कृतिक एकरूपता होती है। वे एक ही मुखिया के प्रभुत्व को स्वीकार करते हैं और अपने आपको एक ही पूर्वज की सन्तान मानते हैं।

Published
2021-12-22