सांकेतिक जलवायु आपातकाल, निराशाजनक रवैया: कुछ सुझाव
Abstract
हमने अपने जीवन में बहुत से आपातकाल सुने और देखे हैं, लेकिन अंधाधुंध विकास की दौड़ और प्राकृतिक संसाधनों के अतिरिक्त दोहन करने के कारण हमने एक विशिष्ट आपातकाल को स्वयं ही अपने ऊपर ओढ़ लिया है। हमने प्रकृति को छिन्न-भिन्न कर दिया है, यहां तक कि मौसमी चक्र भी गड़बड़ा गया है।
पूरे विश्व में मौसम चाहे वह हिमपात, वर्षा या ऊष्णता किसी का भी हो, जनमानस को आकुल करने बाला है। यह अति मौसम हर क्षेत्र और स्थिति को प्रभावित कर रहा है। वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिंग अवधारणा पेश करते हुए जलवायु परिवर्तन पर मुहर लगाई है। अगर हमने गैसों का उत्सर्जन काबू में नहीं किया तो हमारी धरती को आग का गोला बनते देर नहीं लगेगी। मौसम के बदलते ही अघोषित कर्फ्यू जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। दुनिया भर के कई देशों में इन हालातों पर स्वतः ही आन्दोलन जैसी स्थितियां आ गई हैं।



