अटलबिहारी वाजपेयी का हिन्दी को योगदान

  • डॉ0 राधाकृष्ण दीक्षित

Abstract

भारत को स्वतन्त्रता मिलने के बाद भी हिन्दी उसके मस्तक पर स्थापित होने के लिए बहुत लम्बे समय तक संघर्ष करती रही। इस संघर्ष में हिन्दी को विजय श्री प्राप्त कराने के लिए उसके समर्थन, साहित्यकार और समस्त हिन्दी प्रेमी जुट गए। परन्तु बात यदि जनसामान्य में हिन्दी को स्थापित करने की होती तो वह काम तो हिन्दी पहले ही कर चुकी थी, यहां तो उसे राष्ट्रीय गौरव प्राप्त करना था और इस गौरव को प्राप्त करने के लिए राजनीतिक मंच सबसे बड़ा अवरोध था , जहां विभिन्न प्रान्तों के राजनीतिज्ञ केवल इसलिए हिन्दी का विरोध कर रहे थे कि उनकी क्षेत्रीय जनता अपने दैनिक व्यवहार में स्थानीय भाषा का प्रयोग करती थी और उसकी इसी कमजोरी का लाभ उठाकर वे राजनीजिज्ञ भाषा विवाद को जन्म दे, स्वंय को स्थापित करने का प्रयास करने लगे। उनके हाथ में हिन्दी विरोध का झण्डा था, जिसे लेकर वे भारतीय संसद के अंदर तक पहुंच गये और वहां भी वही अभिनय करने लगे। परिणाम स्वरूप हिन्दी की राह कठिन हो गयी, परन्तु वे भूल गये कि संसद के अंदर में अटलबिहारी वाजपेयी जैसे हिन्दी प्रेमी बैठे हैं जो कवि हृदय होने के साथ-साथ हिन्दी के अनन्य भक्त भी हैं।

Published
2021-05-20