मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में चित्रित स्त्री चेतना
Abstract
मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा क्रमशः दो भागों में 'कस्तूरी कुण्डल बसै’ 2002 और 'गुड़िया भीतर गुड़िया" (2008)राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। “कस्तूरी कुण्डल बसै' में लेखिका ने अपने जीवन के हर पहलू को उजागर कियाहै। वह स्वयं कहती हैं- “मैंने साहित्यिक ईमानदारी के लिए जिन्दगी दाव पर लगा दी।”1 आत्मकथा पढ़ने पर यह सचप्रतीत होता है। कोई भी बात परदे में नहीं रख पाती। परिवार के तीन बेटियों की चिंता न करते हुए अपने जीवन कोबेपर्दा किया। उन्होंने आत्मकथा जगत में एक मिसाल कायम की हैं। ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथाका दूसरा भाग है। इसमें उन्होंने अपने साहित्य लेखन का प्रारंभ और उसके विविध पड़ावों का उल्लेख किया है।



