भारतीय संस्कृति और एकात्म मानवदर्शन
Abstract
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना काल से ही पंडित दीन दयाल उपाध्याय संगठन के वैचारिक मार्गदर्शक और नैतिक प्रेरणास्त्रोत रहे हैं। उनहोंने ‘एकात्म मानव दर्शन‘ जैसी प्रगतिशील विचारधारा से दुनिया का परिचय करवाया। उनका दर्शन पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों की सशक्त समालोचना है। उनका वैचारिक दर्शन मानव मात्र की अवश्यकताओं के अनुरूप जीवन दर्शन है। वे उस परंपरा के वाहक थे, जो भारत के नवनिर्माण की बजाए भारत के पुनःर्निमाण की बात करते हैं। उनकी विचारधारा का मुख्य पहलु एकात्म मानव दर्शन ही था। जिस समय पूरा विश्व पूंजीवाद और साम्यवाद की अच्छाई और बुराई की बहस में उलझा हुआ था, उसी वक्त पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने इन दोनों विचारधाराओं को नकारते हुए ‘एकात्म मानव दर्शन‘ की अवधारणा प्रस्तुत की। भारतीय संस्कृति के विचार और दर्शन की ही उपज एकात्म मानव दर्शन है। पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने कभी भी इस बात का दावा नहीं किया कि उन्होंने दुनिया के सामने कोई नया विचार दर्शन प्रस्तुत किया है। वे बार-बार कहते रहे कि ‘एकात्म मानव दर्शन‘ के जरिए वे भारत की सनातन संस्कृति की ही बात कर रहे हैं। भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों का कुल जोड़ ‘एकात्म मानव दर्शन‘ है। सनातन धर्म के आईने के रूप में ‘एकात्म मानव दर्शन‘ को देखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति की विशिष्टताओं, अध्यात्म, कर्मशीलता, प्रकृति से एकात्मता, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और विविधता को एकरूपता में पिरोने वाला सूत्र ‘एकात्म मानव दर्शन‘ ही है। दीन दयाल उपाध्याय ने एकात्म मानव दर्शन का विचार हम सभी के सम्मुख रखा, वह वस्तुतः नया विचार नहीं था। भारतीय ज्ञान परंपरा में युगों-युगों से जो ज्ञान चला आ रहा था जिसको हम कालांतर में परातंत्र के कारण विश्मित कर बैठे थे, उसे पुनः देश-काल-परिस्थितियों के अनुकूल बनाकर हमारे सम्मुख पंडित दीन दयाल उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत किया गया। ‘एकात्म मानव दर्शन‘ के नाम पर उपाध्याय उन्हीं बातों को कह रहे हैं जो भारत में ‘धर्म‘ के नाम पर कही गई हैं। 21 से 25 अप्रैल, 1965 को मुंबई में भारतीय जनसंघ द्वारा एक भाषणमाला संपन्न करवाई गई, जिसमें उन्होंने विस्तारपूर्वक अपने चार व्याख्यानों के माध्यम से विस्तारपूर्वक ‘एकात्म मानव दर्शन‘ का स्पष्टीकरण किया था। लेकिन इसके पीछे भी एक पूरी प्रक्रिया है। भारतीय जनसंघ का ग्वालियर में प्रशिक्षण वर्ग जो 11 से 15 अगस्त, 1964 तक चला और उस प्रशिक्षण वर्ग में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए जो सिद्धांत और नीति, प्रलेख प्रस्तुत किया गया था, उसी वक्तव्य में पहली बार ‘एकात्म मानव दर्शन‘ की प्रतिष्ठापना हुई।



