आदिवासी केंद्रित हिंदी उपन्यासों का सांस्कृतिक मूल्यांकन
Abstract
संस्कृति का अभ्युदय मानव विकास के साथ-साथ होता है । आदिवासी समाज की संस्कृति आज उन तत्वों को अपने में समाहित और संजोए रखी है जो मानव विकास के आरंभिक चरणों से परंपरा के रूप में चले आ रहे हैं । इस संस्कृति में ऐसी विशेषताएँ हैं जो इसे अन्य संस्कृति से अलग करती हैं और इस संस्कृति का जब तक हम पड़ताल अथवा विश्लेषण नहीं करते तब तक आदिवासी समाज को समझना भी कठिन हो जाता है । अतः जनजातीय सांस्कृतिक पहलूओं को समझना आवश्यक हो जाता है ।
भारतीय जनजातीय समूहों में लिखित परंपरा की तुलना में मौखिक परंपरा अधिक समृद्ध रही है जिसके अंतर्गत लोककथा, लोकनृत्य, लोकगीत, चित्रकला तथा उनके समूह गुणधर्मों के तत्व सम्मिलित होते हैं । सामूहिकता की परंपरा, सुख-दुःख, प्रकृति से निकटतम संबंध तथा प्रकृति के साथ उनके संवेदनात्मक संबंध के साथ-साथ उनकी आकांक्षाएँ, संघर्ष का मार्मिक उदघाटन उनके लोक साहित्य में होता है । भारत की सामसिक संस्कृति में आदिवासी संस्कृति का स्थान बहुत सम्मानजनक है, क्योंकि इनकी संस्कृति में प्रागैतिहासिक विशेषताएँ आज भी सुरक्षित हैं । सामूहिक नृत्य की वेशभूषा, नृत्य प्रणाली, केश-रचना, अलंकार, अस्त्र-शस्त्र, वाद्य साधन, गीत अंग-प्रत्यंग, गीतों में नखशिख वर्णन, अभिनय में प्रकृति में छुपा लालित्य, लय, नाद, वर्ण, आकार आदि विशेषताएँ आज भी हमारे लिए आश्चर्यजनक ही नहीं वरण आदरणीय है, जिनका हमें सम्मान के साथ संरक्षण करना आवश्यक है ।



