मानवाधिकार की अवधारणा और वैश्विक स्वरूप
Abstract
प्रारंभ से ही मनुष्य मुख्यतः मानव-कर्तव्वों की छाया में जीता था।आज का आदमी मुख्यतः मानव-अधिकारों की छाया में जीता है।अधिकारों की यह फैलती हुई चेतनामानव-स्वतन्त्रता का एक नया रोमांचक अध्याय है।किसी भी देष के सभ्य और सुसंस्कृत होने की कसौटी अब यह नहीं रही कि वह कितना अमीर या बलषाली है।कसौटी यह है कि वहाँ मानवअधिकारों का कितना सम्मान होताहै। यह दुर्भाग्य पूर्णहैकि शीतयुद्ध के दौरान मानव अधिकर आन्दोलन पर अमेरिका तथा मध्य यूरोप की विष्वराजनीति का जा ेग्रहण लगा था, उसकी छाया अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।इसक ेबावजूद मानवअधिकारों की चेतना व्यापक होती जा रहीहै और उनका दर्षन ज्यादा गहरा तथा प्रमाणिक बनता जा रहा है। यह स्थिति मनुष्य की कुछ गहरी जरूरतों को ही रेखांकित करती है।



