मन की अवधारणाः श्रीमद्भगवद्गीता के संदर्भ में
Abstract
शरीर, मन और चेतना के सम्यक् विज्ञान से मनुष्य का निर्माण होता है। ये तीन आधार स्तम्भ जिस मनुष्य के स्वस्थ और दैवीय सम्पदा से युक्त होंगे वह मनुष्य उतना ही सुखी, आनन्दित और मुक्ति के पथ पर अग्रसर होगा अन्यथा अस्वस्थ और आसुरी सम्पदाएं मनुष्य को दुःख, विनाश और मृत्यु की ओर ही ले जाती हैं। इन तीन स्तम्भों में भी मन ही प्रमुख है जिसके साधने पर अन्य दो स्तम्भ बहुत हद तक सध जाते हैं। मन को साधने के लिए श्रीमöगवद्गीता सहित सभी ग्रंथों में विविध युक्तिओं का वर्णन किया गया है। श्रीमöगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को मन की चंचलता शान्त करने के उपाय बताकर मन को संयमित और एकाग्र बनाने के लिए योग की विविध युक्तियों का वर्णन करते हैं। जिससे साधक सुख, शान्ति और परम गति की ओर अग्रसर होता है।



