श्रीमद्भगवद्गीता के संदर्भ में मानसिक प्रबन्धन

  • अखिलेश कुमार विश्वकर्मा

Abstract

वर्तमान में मनुष्य ने सुख और शान्ति की खोज में शरीर, समय, श्रम और धन का अपरिमित दोहन किया है। प्रत्युत शान्ति तो नही पर संसाधनों का अपार संग्रह हो गया है। जीवन में शान्ति और सृजन का लक्ष्य विस्मृत हो गया है और जीवन का उद्देश्य अब शान्ति नही संसाधनों का संग्रह बन गया है। संसाधन संग्रह के क्रम में मनुष्य ने अपनी आत्मा सहित जीवन के सम्पूर्ण आयामों का हनन किया है। जीवन अव्यवस्थित, असंतुलित एवं अनियोजित हो गया है। मनुष्य आज पुनः सुख, शान्ति और आनन्द की खोज में बेचेन हुआ भटक रहा है। जिसके समाधान हेतु भांति-भांति के प्रयास भी कर रहा है। परन्तु जीवन प्रबंधन के इस क्रम में मानसिक प्रबन्धन अधिक उपयोगी एवं वर्तमान में प्रासांगिक दृष्टिगोचर होता है। यद्यपि जीवन प्रबन्धन के अनेक आयामों में मनुष्य प्रयासरत है परन्तु बिना मानसिक प्रबन्धन के अन्य सारे प्रबन्धन का प्रभाव अत्यल्प है। यदि मन की लगाम मनुष्य के हाथ में है तो सम्पूर्ण जीवन का प्रबन्धन आसान है। श्रीमद्भगवद्गीता हालांकि सम्पूर्ण जीवन प्रबन्धन का शास्त्र है तथापि वर्तमान आवश्यकता के अनुसार मानसिक प्रबन्धन देखना आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में विषयों के संपर्क में मन की चंचलता, असंयमित स्थिति एवं वासनाओं में ंसंलग्न जैसे स्वरूप को बता कर मन को एकाग्र, संयमित बनाने के मार्ग सुझाते हैं। जिस से मनुष्य को आत्मस्थ, योगी, स्थितप्रज्ञ होने का संदेश देते हैं। मन को विषयों में भटकाने वाले मार्ग से आत्मस्वरूप की दिशा देने की प्रक्रिया ही मानसिक प्रबन्धन है।

Published
2020-08-12