दयानन्द के दर्शन का समालोचनात्मक मूल्यांकन
Abstract
स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म नाम मूलशंकर था।मोरवी(गुजरात) में एक सामवेदी ब्राम्हण परिवार में 1824 में उनका जन्म हुआ था। 21 वर्ष की आयु में उन्होंने गृह त्याग दिया तथा ज्ञान की खोज में देश के विभिन्न भागों का भ्रमण करते रहे। 1860 में उनका सम्पर्क मथुरा के स्वामी विरजानन्द से हुआ,इनके सम्पर्क में दयानन्द ने वेद विद्या का ज्ञान प्राप्त किया। 16 वीं शताब्दि में ईसाई (कैथोलिक) धर्म को उसकि बुराईयों तथा विकृतियों से मुक्त कराने के लिए धर्म-सुधारवादी आंदोलन को शुरु करने का श्रेय जिस प्रकार मार्टिन लूथर को दिया जाता है , 19 वीं सदी में भारत में हिन्दू समाज तथा हिन्दू धर्म में प्रचलित अनेक बुराईयों के सुधार की योजना दयानन्द ने अपने हाथों में ली थी। इसीलिये दयानन्द को ‘‘भारतीय लूथर‘‘ कहा गया है। अपने विचारों एवं संगठन के माध्यम से दयानन्द ने जिस नवीन सामाजिक , धार्मिक एवं राजनीतिक चेतना का आविर्भाव किया था वही चेतना कालान्तर में भारतीय राजनीतिक चेतना की आाधारशिला बन गई।इसीलिए दयानन्द का भारतीय ‘‘राष्ट्रीय पुनर्निमाण का प्रबल मन्त्रदृष्टा‘‘ कहा जाता है।



