अगर यादें मुर्गियां होती

  • इप्शिता सेनगुप्ता

Abstract

यह यादें अगर मुर्गियां होती तो बड़ा मज़ा आता | जितनी बार कोई याद हमें याद आती; हम कहते, “भाई, मुर्गी ने अंडा दिया है |” और इसी तरह हर याद की याद एक नए अंडे से जुड़ जाती | यह जो मुर्गी वाली याद होती, वह बड़ी शिद्दत से अण्डों को ताव देती | वक़्त के साथ यह अंडे फूटते | कोई किस्सा बन जाता, कोई कहानी का रूप लेती | कोई गीत, तो कोई ग़ज़ल बनती |
Published
2015-08-04