सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा और दलित साहित्य
Abstract
दलित शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत धातु 'दल' से हुई हैं | जिसका अर्थ हैं दलन , दमन , विकसना , फटना, खंडित , होना , मर्दित होना , विनष्ट किया हुआ, मसला हुआ आदि |
दलित वर्ग के जनक डॉ. भीमराव आंबेडकर ने दलित वर्ग को एक महामंत्र दिया- "शिक्षित बनो , संगठित हो तथा संघर्ष करो |" इससे दलित वर्ग में नयी चेतना आयी| धीरे -धीरे इस चेतना ने एक आंदोलन का रूप ग्रहण कर लिया |
आंदोलन ने समाज में सामाजिक एकता , समानता , एकता , बंधुत्व के लिये पारस्परिक मान्यताओं को नकारा | वर्ग व्यवस्था को नकारा और अंत में इस वर्ग की सभ्यता और संस्कृति साहित्य का रूप बन गयी और वर्तमान में दलित साहित्य के रूप में स्थापित विधा के अंतर्गत दलित कविता संत रैदास और कबीर से होती हुई 'हीरा डोम और अछूतानंद' तक आयी | उसके बाद रैदास और अंबेडकर की विचार धारा में निरंतर प्रवाहित होकर १९ वी शताब्दी तक आयी | १९ वि शताब्दी में भी दलित कविता लोकगीतों के रूप में आगे बढ़ती परन्तु साठ के दशक में हिंदी के दलित कवियों ने मराठी दलित साहित्य से प्रेरणा लेकर हिंदी में दलित साहित्य का सृजन किया जो वर्तमान में परिलक्षित हो रहा हैं|



