उपन्यासकार प्रेमचंद की सामाजिक चेतना

  • Ms सुनीता

Abstract

शोध सार :- प्रेमचंद एक ग न सामाजिक सरोकार के रचनाकार र े ैं। उनका सरोकार र ा ै -देश सेिा ,देश की उस ८०प्रजतशत िनता की सेिा िो िीतोड़ म ेनत के बाििूद अपनी न्यूनतम बुजनयादी िरूरतें भी पूरी करने में असमर्थि र ी ै। अपने युग की सम्पूर्ि रािनैजतक-सामाजिक पररस्थर्थजतयों को ध्यान में रखकर ी उन्ोनंे अपनी सामाजिक चेतना को साकार जकया। प्रेमचंद की सामाजिक चेतना का सिािजधक म त्वपूर्ि के न्द्र भारत की शोजषत उत्पीजड़त िनता जिशेषत: िो जकसान और मिदूर के रूप में गााँिों में र ती ै,उसी की िास्तजिक मुस्ि र ा ै। इस िनता के उद्धार के जलए प्रेमचंद ने एक व्यापक अजभयान अपने साज त्य और साज त्येत्तर लेखन के माध्यम से चलाया ,'सेिासदन' से 'गोदान'तक आते आते भीतर ी भीतर उनके जिचारों में क्रस्िकारी पररितिन ो चुके र्थे। य ााँ तक आते-आते प्रेमचंद का आदशोन्मुख यर्थार्थििाद यर्थर्थोन्मुख आदशििाद बन गया र्था। प्रेमचंद िी ने मज लाओं से संबस्ित पाररिाररक और सामाजिक रीजतररिािों ि पररस्थर्थतयों को भी अपने उपन्यासों में जिशेष थर्थान जदया ै। इनके उपन्यासों में व्यस्ि चेतना, समाि मंगल,यर्थार्थि की अनुभूजत,आदशि की कल्पना,आंतररक मनोमंर्थन एिं भािदन्द सभी कु छ जमल िाता ै।

Published
2015-11-20