हो जाओ मुझसे रु-ब-रु
Abstract
हो जाओ मुझसे रु-ब-रु लो मैं हूँ प्रस्तुत मैं ही हूँ ‘साहिल’ कोई कहता है जाहिल कोई कहता है पागल कोई आवारा बादल तो कोई कहता है कवि आपमें है दिनकर की छवि आप तो नव युग के रवि आलोकित होगा विश्व आप लिखते रहिये आलोचकों की सुनते रहिये आप कवि कार्य करते रहिये ये कहते है हमारे एक प्रशंसक जो हमारी कविताओं का और हमारी ग़ज़लों का करते है तारीफ वो भी है एक कवि एक नए लेखक पर कहते है मेरे भ्राता तू यह क्या लिखता कभी गजल तो कभी कविता क्यों तू गीत लिखता मान मेरी बात देख घर की हालत तू छोड़ दे सपना तू छोड़ से लिखना मत बन साहित्यकार शायर या गीतकार तू ही बोल मेरे भाई लिखने से कब हुआ खुद की भलाई पड़ी है हमने भी जीवनी दर्द भरी कहानी लेखकों की, कवियों की लिखने से नहीं चलता जीविका आ जाता है नौबत भखें मरने का तू भी मान जा मेरे भाई छोड़ दे किस्मत से लड़ाई
जीवन जंग है संघर्ष है, संग्राम है वास्तविकता से टकराना पड़ता है मुसिवातों से झुझना पड़ता है
छोड़ दे मेरे भाई लिखना खवाबों के पुल बंधना और कागजी घोड़ें दौड़ना कागज ओज कलम के बिच हमेश उलझें रहना बात मेरी मान आज कहते है हम तोड़ दल कलम फाड़ से कागज
पर कम मैं मानता जब वक्ता मिलता मैं लिखता कभी गजल तो कभी कविता एक दर्द है चुभता पल पल सच कहता है ‘साहिल’शायद यही दर्द जिसका नहीं कोई इलाज पता है अभिव्यक्ति
यही आज-कल बनकर कविता की पंक्ति गीत या गजल ये अजब सा दर्द है मैं चाहूँ जितना दबाना
बढता है ये उतना यह दर्द यह आग मैं जलता हूँ पल पल जल रहा हूँ आज जलता रहूँगा कल
तय करना है तुझें मेरे भाई मैं जलकार रोशनी करूँ या जलकर हो जाऊ राख़!



