जिंदगी की गस्त में

  • सुनीता देवी

Abstract

एक नन्हा सा जान
लेकर उंगली का सहारा
था शीखा चलना
दौरना और खेलना
सीखा था हँसाना
लोगों के साथ चलना
पर इसी जिंदगी की रेल में
हर कोई साथ नहीं करता सवारी
चलना परता है

Published
2017-06-16