श्श्रीमद्भगवत्गीता का एक ऐतिहासिक मूल्य

  • डा ॅ0 दलजीत सिंह

Abstract

भगवान अनन्त है - उनका
सर्वस्व ही अनन्त है, तब भगवान
केशव जी महाराज के मुखारविन्द से
निकली हुई गीता के भावों का अन्त
भला कैसे हो सकता है अर्थात् कभी
भी नहीं हो सकता है। जब तक
आकाश में सूर्य चन्द्र है पृथ्वी पर
नदियां और पर्वत विद्यमान है तब
तक हर घर में गीता का पठन-पाठन
सदैव होता रहेगा। वास्तव में
श्रीमद्भगवत्गीता का माहत्मय वाणी
द्वारा वर्णन करने के लिए या लेखनी
द्वारा लिखने के लिए किसी में भी
सामर्थ्य नहीं है चाहे वे कितने भी
बड़े ऋर्षि.मुनि, सन्त महात्मा क्यों न
हो और उनकी वाणी कितनी भी
श्रेष्ठ क्यों न हो, पर वह भगवान
की दिव्यातिदिव्य वाणी ष्गीताष् की
बराबरी नहीं कर सकती।

Published
2017-06-12