भारतीय सामाजिक मूल्य : एक समाजशास्त्रीय अध्ययन
Abstract
‘‘मनुष्य को मूल्य अपने जीवन से अपने पर्यावरण से, अपने आप (स्वयं) से, समाज और संस्कृति से ही नहीं, अपितु मानव-अस्तित्व व अनुभव से भी प्राप्त होते है।(1) डॉ0 राधाकमल मुकर्जी (ष्ैवबपंस ैजतनबजनतम वि टंसनमेष्)
सामाजिक मूल्य समाज की धरोहर ही नहीं, बल्कि एक ऐसा सुदृढ़ आधार है जिस पर सम्पूर्ण समाज के विकास व उन्नति की नींव टिकी होती है। मानव जीवन का आधार जीवन मूल्य ही है। पाप-पुण्य, उचित-अनुचित, शुभ-अशुभ की अवधारणा, जीवन मूल्यों पर आधारित है। मानव समाज में जीवन मूल्य सामाजिक सांस्कृतिक धरातल पर ही जीवित रहते है। समाजशास्त्रीय अर्थ में, मूल्य या सामाजिक मूल्य वे सामाजिक मान,लक्ष्य या आदर्श हैं जिनके आधार पर विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों तथा नियमों का मूल्यांकन किया जाता है। ये मूल्य हमारे लिए कुछ अर्थ रखते हैं ये मूल्य हमारे सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। इन मूल्यों की एक सामाजिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि होती है इसलिए प्रत्येक समाज के मूल्यों में भिन्नता देखने को मिलती है। उदाहरणस्वरूप -भारतीय समाज के हिन्दुओं में विवाह के प्रति एक विशिष्ट सामाजिक मूल्य यह है कि विवाह-बन्धन एक पवित्र व धार्मिक बन्धन है, इस कारण इसे अपनी इच्छानुसार तोड़ा नहीं जा सकता । साथ ही, यह पवित्रता तभी बनी रह सकती है जबकि पति-पत्नी एक दूसरे के प्रति वफादार रहें जिसका प्रभाव यह है कि विवाह विच्छेद की भावना पनप नही पाती है और विधवा-विवाह को उचित नहीं माना जाता है।



