बारिस कि बूंदें

  • माया देवी

Abstract

उतारी है गगन से

हजारों परियां

बनकर बारिस कि बूंदें

नाच रही है छम-छम

हवावों के झोंकों से

कभी इधर

तो कभी उधर

मचल रही है झूम-झूम

इनकी मधुर तन से

हर्षा रहा है मेरा मन

वो गा रही है प्रेम-गान

होकर मस्त मगन

जैसे हो मेरा हमदम 

Published
2017-10-16