देख रहा ठहरा साहिल

  • देव कुमार शर्मा

Abstract

हम साहिल
बैठे देख रहे है
दरिया की मौजें
सदा बहती इसकी पानी
कह रही संस्कृति की कहानी
जीवन की रवानी
मौज-इ-जवानी
है मेरा दिल फूलों से नाजुक
चोट खाए है
फूलों की पंखुरियों से
चुभा है दिल में
कांटें नहीं
फूलों की खुसबू
है मेरे दिल की दास्ताँ

Published
2017-10-13